भारत को 2030 तक एफएमडी-मुक्त बनाने का लक्ष्य: नई दिल्ली में तीन दिवसीय कार्यशाला संपन्न
पशुपालन और दुग्ध उत्पादन विभाग ने डब्ल्यूओएएच के सहयोग से एफएमडी-मुक्त क्षेत्रों के विकास और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया।

मत्स्य पालन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन मंत्रालय के पशुपालन और दुग्ध उत्पादन विभाग (DAHD) ने विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) के सहयोग से 15 से 17 सितंबर, 2026 तक नई दिल्ली के राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (NASC) में एक तीन दिवसीय पीवीएस-पीपीपी लक्षित सहायता कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का मुख्य विषय "भारत में एफएमडी-मुक्त क्षेत्र विकास" था।
इस आयोजन में DAHD, 12 राज्यों के पशुपालन विभागों, WOAH पेरिस, NDDB, ICAR अनुसंधान संस्थानों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यशाला का उद्देश्य तकनीकी विश्लेषण, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) डिजाइन और WOAH मानकों के माध्यम से राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय एफएमडी-मुक्त क्षेत्र कार्य योजनाओं को मजबूत करना था।
पशुपालन और डेयरी विभाग के सचिव श्री नरेश पाल गंगवार ने बताया कि भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक एफएमडी (Foot and Mouth Disease) को नियंत्रित कर देश को इससे पूरी तरह मुक्त करना है। उन्होंने जानकारी दी कि अब तक 147.16 करोड़ से अधिक एफएमडी वैक्सीन खुराक दी जा चुकी हैं, जिससे लगभग 8.04 करोड़ किसानों को लाभ मिला है। आंकड़ों के अनुसार, एफएमडी के प्रकोप वर्ष 2019 में 132 थे, जो 2025 में घटकर 40 और अगस्त 2026 तक 20 रह गए हैं। साथ ही, 2025 तक एनएसपी एंटीबॉडी पॉजिटिविटी में 8.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
श्री गंगवार ने यह भी स्पष्ट किया कि विभाग ने एफएमडी मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए दिशानिर्देश विकसित किए हैं और 2025 में पशु चिकित्सा अवसंरचना के न्यूनतम मानक निर्धारित किए हैं। राज्यों को उनकी बुनियादी कमियों को दूर करने के लिए राज्य सहायता (SASCII) ढांचे के तहत पूंजी निवेश की मदद दी जा रही है।
कार्यशाला के दौरान नौ प्राथमिकता प्राप्त राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपनी प्रस्तावित कार्य योजनाएं प्रस्तुत कीं, जिन पर WOAH विशेषज्ञों ने तकनीकी प्रतिक्रिया दी। चर्चाओं में टीकाकरण प्रणाली, निगरानी, निदान साझेदारी, पशु पहचान और निवेश मॉडल जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) केवल वित्तीय मदद तक सीमित न रहकर टीकों की आपूर्ति, वितरण, निदान और जोखिम संचार जैसे सभी पहलुओं को शामिल करे।
समापन सत्र में पशुपालन आयुक्त डॉ. नवीना बी. महेश्वरप्पा ने विश्वास व्यक्त किया कि राज्य सरकारें इन परिणामों को साक्ष्य-आधारित और समयबद्ध कार्य योजनाओं में बदलेंगी। यह पहल भारत को 2030 तक एफएमडी-मुक्त घोषित करने के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।



